श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 76: भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान‍्द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.76.15 
ये त्वन्ये पृथिवीपाला: समेता: सर्वतो दिश:।
कामक्रोधौ समुत्सृज्य ते ब्रुवन्तु यथामति॥ १५॥
 
 
अनुवाद
'चारों दिशाओं से यहाँ आये हुए अन्य राजाओं को चाहिए कि वे अपनी समस्त कामनाओं और क्रोध को त्यागकर अपनी बुद्धि के अनुसार इस प्रश्न का उत्तर दें॥15॥
 
'The other kings who have arrived here from the four directions should give up all their desires and anger and answer this question to the best of their intelligence.॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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