श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 76: भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान‍्द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  2.76.14 
भारद्वाजश्च सर्वेषामाचार्य: कृप एव च।
कुत एतावपि प्रश्नं नाहतुर्द्विजसत्तमौ॥ १४॥
 
 
अनुवाद
'हमारे आचार्य भारद्वाजनंदन द्रोणाचार्य और कृपाचार्य, ये दोनों ही ब्राह्मण कुल के श्रेष्ठ पुरुष हैं। ये दोनों इस प्रश्न पर अपने विचार क्यों नहीं व्यक्त करते?'
 
'Our Acharya Bhardwajnandan, Dronacharya and Kripacharya, both of them are the best men of the Brahmin clan. Why don't both of them express their views on this question?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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