श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 76: भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान‍्द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  2.76.1 
भीम उवाच
भवन्ति गेहे बन्धक्य: कितवानां युधिष्ठिर।
न ताभिरुत दीव्यन्ति दया चैवास्ति तास्वपि॥ १॥
 
 
अनुवाद
भीमसेन बोले - भ्राता युधिष्ठिर! जुआरियों के घर में प्रायः कुलटा स्त्रियाँ रहती हैं, परन्तु वे उन्हें दाँव पर लगाकर जुआ नहीं खेलते। उन कुलटा स्त्रियों के प्रति भी उनके हृदय में दया रहती है॥1॥
 
Bhimsen said - Brother Yudhishthira! Often, there are promiscuous women in the houses of gamblers, but they do not gamble by putting them at stake. They have compassion in their hearts even for those promiscuous women.॥ 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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