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mahabharat 2.75.47: उस समय भीष्म बोले - हे सौभाग्यवती पुत्रवधू! धर्म का स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण मैं तुम्हारे प्रश्न का समुचित उत्तर नहीं दे सकता। जो स्वामी नहीं है, वह दूसरे का धन जुए में नहीं हार सकता, किन्तु स्त्री तो सदैव अपने पति के अधीन ही देखी जाती है, अतः इन सब बातों पर विचार करने के पश्चात् मैं कुछ भी कहने में असमर्थ हूँ।   |   mahabharat अध्याय 2.75: प्रातिकामीके बुलानेसे न आनेपर दु:शासनका सभामें द्रौपदीको केश पकड़कर घसीटकर लाना एवं सभासदोंसे द्रौपदीका प्रश्न   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 75: प्रातिकामीके बुलानेसे न आनेपर दु:शासनका सभामें द्रौपदीको केश पकड़कर घसीटकर लाना एवं सभासदोंसे द्रौपदीका प्रश्न  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  2.75.47 
भीष्म उवाच
न धर्मसौक्ष्म्यात् सुभगे विवेक्तु
शक्नोमि ते प्रश्नमिमं यथावत्।
अस्वाम्यशक्त: पणितुं परस्वं
स्त्रियाश्च भर्तुर्वशतां समीक्ष्य॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
उस समय भीष्म बोले - हे सौभाग्यवती पुत्रवधू! धर्म का स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण मैं तुम्हारे प्रश्न का समुचित उत्तर नहीं दे सकता। जो स्वामी नहीं है, वह दूसरे का धन जुए में नहीं हार सकता, किन्तु स्त्री तो सदैव अपने पति के अधीन ही देखी जाती है, अतः इन सब बातों पर विचार करने के पश्चात् मैं कुछ भी कहने में असमर्थ हूँ।
 
At that time Bhishma said - O fortunate daughter-in-law! Since the nature of religion is very subtle, I cannot explain your question properly. One who is not a master cannot gamble away someone else's wealth, but a woman is always seen to be under the control of her husband, so after considering all these things, I am unable to say anything. 47.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)