श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 67: जूएके अनौचित्यके सम्बन्धमें युधिष्ठिर और शकुनिका संवाद  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  2.67.21 
युधिष्ठिर उवाच
अन्येनान्यस्य वै द्यूतं विषमं प्रतिभाति मे।
एतद् विद्वन्नुपादत्स्व काममेवं प्रवर्तताम्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले - दूसरे का जुआ दूसरे के लिए खेलना मुझे अनुचित लगता है । विद्वान् ! इसे समझ लो, फिर तुम्हारी इच्छानुसार द्यूत क्रीड़ा आरम्भ हो सकती है । 21॥
 
Yudhishthir said – It seems unfair to me to play someone else's game for someone else. Scholar! Understand this, then the gambling game can begin as per your wish. 21॥
 
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि युधिष्ठिरशकुनिसंवादे एकोनषष्टितमोऽध्याय:॥ ५९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें युधिष्ठिरशकुनिसंवादविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५९॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)