श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 64: धृतराष्ट्र और दुर्योधनकी बातचीत, द्यूतक्रीड़ाके लिये सभानिर्माण और धृतराष्ट्रका युधिष्ठिरको बुलानेके लिये विदुरको आज्ञा देना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  2.64.7 
दुर्योधन उवाच
व्यपनेष्यति ते बुद्धिं विदुरो मुक्तसंशय:।
पाण्डवानां हिते युक्तो न तथा मम कौरव॥ ७॥
 
 
अनुवाद
दुर्योधन ने कहा- पितामह! विदुर सब प्रकार से संशयरहित हैं। वे आपके मन को जुए के निर्णय से हटा देंगे। कुरुपुत्र! वे पाण्डवों के कल्याण में उसी प्रकार लगे रहते हैं, जिस प्रकार वे मेरे कल्याण में लगे रहते हैं।
 
Duryodhan said- Father! Vidur is free from doubts in every respect. He will remove your mind from the decision of gambling. Son of Kuru! He remains engaged in the welfare of Pandavas in the same way as he remains engaged in my welfare. 7.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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