|
| |
| |
श्लोक 2.64.22  |
सभेयं मे बहुरत्ना विचित्रा
शय्यासनैरुपपन्ना महार्है:।
सा दृश्यतां भ्रातृभि: सार्धमेत्य
सुहृद्द्यूतं वर्ततामत्र चेति॥ २२॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| उनसे कहो, 'मेरी यह अद्भुत सभा नाना प्रकार के रत्नों से जड़ित है। यह बहुमूल्य शय्याओं और आसनों से सुशोभित है। युधिष्ठिर! तुम अपने भाइयों सहित यहाँ आकर इसे देखो और यहीं पर मित्रों के बीच द्यूतक्रीड़ा आरम्भ करो।' |
| |
| Tell them, 'This wonderful assembly of mine is studded with many kinds of gems. It is decorated with precious beds and seats. Yudhishthira! Come here with your brothers and see it and let the game of dice among the friends begin here.' |
| |
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि युधिष्ठिरानयने षट्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें युधिष्ठिरके बुलानेसे सम्बन्ध रखनेवाला छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५६॥
|
| |
| ✨ ai-generated |
| |
|