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श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 57: धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  2.57.8 
ऐश्वर्यं हि महत् पुत्र त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम्।
भ्रातर: सुहृदश्चैव नाचरन्ति तवाप्रियम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
बेटा! इस महान धन का भार तुम्हारे ऊपर है। तुम्हारे भाई-बन्धु कभी भी तुम्हारे विरुद्ध आचरण नहीं करेंगे।
 
Son! The burden of all this great wealth is on you. Your brothers and friends never behave against you. 8.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)