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mahabharat 2.57.35: राजा वैश्यों की भाँति ब्राह्मणों को भोजन कराते थे। राजा युधिष्ठिर के पास जो धन है, वह शायद देवराज इंद्र, यम, वरुण या यक्षराज कुबेर के पास भी नहीं होगा। ॥ 35॥   |   mahabharat अध्याय 2.57: धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 57: धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  2.57.35 
वैश्या इव महीपाला द्विजातिपरिवेषका:।
न सा श्रीर्देवराजस्य यमस्य वरुणस्य च।
गुह्यकाधिपतेर्वापि या श्री राजन् युधिष्ठिरे॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
राजा वैश्यों की भाँति ब्राह्मणों को भोजन कराते थे। राजा युधिष्ठिर के पास जो धन है, वह शायद देवराज इंद्र, यम, वरुण या यक्षराज कुबेर के पास भी नहीं होगा। ॥ 35॥
 
Kings used to serve food to Brahmins like Vaishyas. The wealth that King Yudhishthira has, even Devraj Indra, Yama, Varuna or Yaksharaj Kubera may not have it. ॥ 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)