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mahabharat 2.55.31: मैं या तो अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगा, विष खा लूँगा या जल में डूब मरूँगा; अब और जीवित नहीं रह सकूँगा ॥31॥   |   mahabharat अध्याय 2.55: दुर्योधनका मयनिर्मित सभाभवनको देखना और पग-पगपर भ्रमके कारण उपहासका पात्र बनना तथा युधिष्ठिरके वैभवको देखकर उसका चिन्तित होना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 55: दुर्योधनका मयनिर्मित सभाभवनको देखना और पग-पगपर भ्रमके कारण उपहासका पात्र बनना तथा युधिष्ठिरके वैभवको देखकर उसका चिन्तित होना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  2.55.31 
वह्निमेव प्रवेक्ष्यामि भक्षयिष्यामि वा विषम्।
अपो वापि प्रवेक्ष्यामि न हि शक्ष्यामि जीवितुम्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
मैं या तो अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगा, विष खा लूँगा या जल में डूब मरूँगा; अब और जीवित नहीं रह सकूँगा ॥31॥
 
I will either enter the fire, consume poison or drown myself in water; I will not be able to survive anymore. ॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)