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mahabharat 2.55.3-4: एक बार राजा दुर्योधन सभाभवन में भ्रमण करते हुए रत्नजटित एक स्थान पर पहुँचे और वहाँ भीगने के भय से उन्होंने अपने वस्त्र उठा लिए। इस प्रकार मोहग्रस्त होकर उनका मन दुःखी हो गया और वे उस स्थान से लौटकर दूसरी दिशा में सभा में भ्रमण करने लगे।   |   mahabharat अध्याय 2.55: दुर्योधनका मयनिर्मित सभाभवनको देखना और पग-पगपर भ्रमके कारण उपहासका पात्र बनना तथा युधिष्ठिरके वैभवको देखकर उसका चिन्तित होना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 55: दुर्योधनका मयनिर्मित सभाभवनको देखना और पग-पगपर भ्रमके कारण उपहासका पात्र बनना तथा युधिष्ठिरके वैभवको देखकर उसका चिन्तित होना  »  श्लोक 3-4
 
 
श्लोक  2.55.3-4 
स कदाचित् सभामध्ये धार्तराष्ट्रो महीपति:।
स्फाटिकं स्थलमासाद्य जलमित्यभिशङ्कया॥ ३॥
स्ववस्त्रोत्कर्षणं राजा कृतवान् बुद्धिमोहित:।
दुर्मना विमुखश्चैव परिचक्राम तां सभाम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
एक बार राजा दुर्योधन सभाभवन में भ्रमण करते हुए रत्नजटित एक स्थान पर पहुँचे और वहाँ भीगने के भय से उन्होंने अपने वस्त्र उठा लिए। इस प्रकार मोहग्रस्त होकर उनका मन दुःखी हो गया और वे उस स्थान से लौटकर दूसरी दिशा में सभा में भ्रमण करने लगे।
 
Once, while roaming in the assembly hall, King Duryodhan reached a place studded with crystals and gems and fearing that it might get wet, he lifted his clothes. Being thus deluded, his mind became sad and he returned from that place and started roaming in the assembly in the other direction.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)