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mahabharat 2.55.12: ऐसा ही एक दरवाज़ा मिला, जिसमें क्रिस्टल के बड़े-बड़े दरवाज़े थे। हालाँकि वह खुला था, दुर्योधन ने सोचा कि वह बंद है और उसने दोनों हाथों से उसे धक्का देने की कोशिश की। लेकिन धक्का लगने से वह खुद ही दरवाज़े से बाहर गिर गया।   |   mahabharat अध्याय 2.55: दुर्योधनका मयनिर्मित सभाभवनको देखना और पग-पगपर भ्रमके कारण उपहासका पात्र बनना तथा युधिष्ठिरके वैभवको देखकर उसका चिन्तित होना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 55: दुर्योधनका मयनिर्मित सभाभवनको देखना और पग-पगपर भ्रमके कारण उपहासका पात्र बनना तथा युधिष्ठिरके वैभवको देखकर उसका चिन्तित होना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  2.55.12 
तादृशं च परं द्वारं स्फाटिकोरुकपाटकम्।
विघट्टयन् कराभ्यां तु निष्क्रम्याग्रे पपात ह॥ १२॥
 
 
अनुवाद
ऐसा ही एक दरवाज़ा मिला, जिसमें क्रिस्टल के बड़े-बड़े दरवाज़े थे। हालाँकि वह खुला था, दुर्योधन ने सोचा कि वह बंद है और उसने दोनों हाथों से उसे धक्का देने की कोशिश की। लेकिन धक्का लगने से वह खुद ही दरवाज़े से बाहर गिर गया।
 
A similar door was found, with large doors made of crystal. Though it was open, Duryodhan thought it was closed and tried to push it with both hands. But due to the push, he himself fell out of the door.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)