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mahabharat 2.50.4: जब उस पुण्यात्मा जरासंध ने इस दुष्टात्मा को ब्राह्मण अतिथि के योग्य चरणामृत तथा अन्य भोजन दिया, तब उसने यह जानकर कि यह ब्राह्मण नहीं है, उसे ग्रहण नहीं किया ॥4॥   |   mahabharat अध्याय 2.50: शिशुपालकी बातोंपर भीमसेनका क्रोध और भीष्मजीका उन्हें शान्त करना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 50: शिशुपालकी बातोंपर भीमसेनका क्रोध और भीष्मजीका उन्हें शान्त करना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.50.4 
येन धर्मात्मनाऽऽत्मानं ब्रह्मण्यमविजानता।
नेषितं पाद्यमस्मै तद् दातुमग्रे दुरात्मने॥ ४॥
 
 
अनुवाद
जब उस पुण्यात्मा जरासंध ने इस दुष्टात्मा को ब्राह्मण अतिथि के योग्य चरणामृत तथा अन्य भोजन दिया, तब उसने यह जानकर कि यह ब्राह्मण नहीं है, उसे ग्रहण नहीं किया ॥4॥
 
When that virtuous Jarasandha offered feet and other food befitting a Brahmin guest to this evil soul, he, knowing that he was not a Brahmin, did not wish to accept it. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)