यज्ञस्य च न विघ्न: स्यात् प्रजानां च हितं भवेत्।
यथा सर्वत्र तत् सर्वं ब्रूहि मेऽद्य पितामह॥ ४॥
अनुवाद
‘पितामह! कृपा करके मुझे वह उपाय बताइए जिससे यज्ञ में विघ्न न पड़े, प्रजा का कल्याण हो और सर्वत्र शान्ति हो।’॥4॥
'Grandfather! Kindly tell me the means by which the yagya should not be obstructed, the subjects should be benefited and peace should prevail everywhere.'॥ 4॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥