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श्लोक  2.46.d67 
एष भोगवतीं गत्वा वासुकिं भरतर्षभ॥
निर्जित्य पुण्डरीकाक्षो रौहिणेयममोचयत्।
 
 
अनुवाद
भरतकुलभूषण! इन कमलनयन श्रीहरि ने भोगवतीपुरी में जाकर वासुकि नाग को पराजित किया और रोहिणी नंदन को बंधन से मुक्त कर दिया।
 
Bharatkulbhushan! This lotus-eyed Shri Hari went to Bhogavatipuri and defeated Vasuki Naga and freed Rohini Nandan from bondage.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)