|
| |
| |
श्लोक 2.46.d16-d17  |
भीष्म उवाच
एवमुक्त्वा सुरर्षिर्वै बाणस्याथ पुरं ययौ॥
नारदस्य वच: श्रुत्वा ततो राजन् जनार्दन:।
आहूय बलदेवं वै प्रद्युम्नं च महाद्युतिम्॥
आरुरोह गरुत्मन्तं ताभ्यां सह जनार्दन:। |
| |
| |
| अनुवाद |
| भीष्मजी कहते हैं- राजन! इतना कहकर देवर्षि नारद बाणासुर की राजधानी शोणितपुर चले गये। नारदजी की बातें सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने बलरामजी और तेजस्वी प्रद्युम्न को बुलाया और उन दोनों को साथ लेकर गरुड़ पर चढ़ गये। |
| |
| Bhishmaji says- Rajan! Saying this, Devarshi Narad went to Shonitpur, the capital of Banasur. Hearing Naradji's words, Lord Shri Krishna called Balramji and the brilliant Pradyumna and along with both of them he mounted on Garuda. |
| ✨ ai-generated |
| |
|