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mahabharat 2.45.d87: भगवान कृष्ण के हाथ शंख, चक्र और गदा जैसे अस्त्रों से सुशोभित थे। वे गरुड़ पर विराजमान थे। उनका तेज सूर्योदय के समान था, जो नई चेतना और उत्साह का संचार कर रहा था। उन्हें देखकर सभी लोग अत्यंत प्रसन्न थे।   |   mahabharat अध्याय 2.45: द्वारकापुरी एवं रुक्मिणी आदि रानियोंके महलोंका वर्णन, श्रीबलराम और श्रीकृष्णका द्वारकामें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  2.45.d87 
शङ्खचक्रगदापाणिं सुपर्णशिरसि स्थितम्॥
दृष्ट्वा जहृषिरे कृष्णं भास्करोदयतेजसम्।
 
 
अनुवाद
भगवान कृष्ण के हाथ शंख, चक्र और गदा जैसे अस्त्रों से सुशोभित थे। वे गरुड़ पर विराजमान थे। उनका तेज सूर्योदय के समान था, जो नई चेतना और उत्साह का संचार कर रहा था। उन्हें देखकर सभी लोग अत्यंत प्रसन्न थे।
 
Lord Krishna's hands were adorned with weapons like conch, chakra and mace. He was sitting on Garuda. His brilliance was like the sunrise, creating new consciousness and enthusiasm. Everyone was very happy to see him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)