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श्लोक  2.45.d50 
यस्तु प्रासादमुख्योऽत्र यं त्वष्टा व्यदधात् स्वयम्॥
योजनायतविष्कुम्भं सर्वरत्नमयं विभो:।
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार, वहाँ एक और महत्वपूर्ण महल है, जिसका निर्माण स्वयं विश्वकर्मा ने किया है। इसकी लंबाई और चौड़ाई एक-एक योजन है। भगवान का वह भवन सभी प्रकार के रत्नों से बना है।
 
Similarly, there is another important palace there, which has been built by Vishwakarma himself. Its length and breadth are one yojana each. That building of God is made of all kinds of gems.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)