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mahabharat 2.45.d32: जैसे भोगवती गंगा भयंकर सर्पों से भरे हुए भयंकर कुण्डों से सुशोभित है, वैसे ही द्वारकापुरी दशरथ वंश के महान भाग्यशाली पुरुषों से भरे हुए उपर्युक्त भवनरूपी हृदयों से सुशोभित है।   |   mahabharat अध्याय 2.45: द्वारकापुरी एवं रुक्मिणी आदि रानियोंके महलोंका वर्णन, श्रीबलराम और श्रीकृष्णका द्वारकामें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 45: द्वारकापुरी एवं रुक्मिणी आदि रानियोंके महलोंका वर्णन, श्रीबलराम और श्रीकृष्णका द्वारकामें प्रवेश  »  श्लोक d32
 
 
श्लोक  2.45.d32 
तैर्दाशार्हमहाभागैर्बभासे भवनह्रदै:।
चण्डनागाकुलैर्घोरैर्ह्रदैर्भोगवती यथा॥
 
 
अनुवाद
जैसे भोगवती गंगा भयंकर सर्पों से भरे हुए भयंकर कुण्डों से सुशोभित है, वैसे ही द्वारकापुरी दशरथ वंश के महान भाग्यशाली पुरुषों से भरे हुए उपर्युक्त भवनरूपी हृदयों से सुशोभित है।
 
Just as the Bhogavati Ganga is adorned with fearsome pools filled with fierce serpents, similarly Dwarkapuri is adorned with the above mentioned building-like hearts filled with the greatly fortunate men of the Dasharha clan.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)