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श्लोक  2.45.d133 
तत: प्राप्ता यशोदाया दुहिता वै क्षणेन हि॥
जाज्वल्यमाना वपुषा प्रभयातीव भारत।
 
 
अनुवाद
उसी समय क्षण भर में यशोदाजी की पुत्री वहाँ आ पहुँचीं। भरत! उनके अंग दिव्य तेज से चमक रहे थे।
 
At this very moment Yashodaji's daughter arrived there in a moment. Bhaarat! Her body parts seemed to be glowing with divine radiance.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)