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mahabharat 2.45.d120: वह विशाल दैत्य सोने की माला पहने हुए था। उस पर बैठे हुए देवराज इन्द्र मंदराचल पर्वत पर प्रज्वलित सूर्यदेव के समान चमक रहे थे।   |   mahabharat अध्याय 2.45: द्वारकापुरी एवं रुक्मिणी आदि रानियोंके महलोंका वर्णन, श्रीबलराम और श्रीकृष्णका द्वारकामें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  2.45.d120 
दिशागजं महामात्रं काञ्चनस्रजमास्थित:।
प्रबभौ मन्दराग्रस्थ: प्रतपन् भानुमानिव॥
 
 
अनुवाद
वह विशाल दैत्य सोने की माला पहने हुए था। उस पर बैठे हुए देवराज इन्द्र मंदराचल पर्वत पर प्रज्वलित सूर्यदेव के समान चमक रहे थे।
 
That huge giant was wearing a garland of gold. Sitting on it, Devraj Indra was shining like the blazing Sun God on the peak of Mandaraachal.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)