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श्लोक  2.45.d117 
पृथिवीं चान्तरिक्षं च दिवं च वरवारणम्।
मुखाडम्बरनिर्घोषै: पूरयन्तमिवासकृत्॥
 
 
अनुवाद
वह महान हाथी अपनी गम्भीर गर्जना से पृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्ग को बार-बार गुंजायमान कर रहा था।
 
That great elephant was repeatedly resonating the earth, space and heaven with his deep roar.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)