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mahabharat 2.44.d5: नरकासुर, सभी देवताओं का अवतार, पृथ्वी के अंदर एक मूर्ति लिंग के रूप में रहता था और मनुष्यों और ऋषियों के विरुद्ध व्यवहार करता था।   |   mahabharat अध्याय 2.44: नरकासुरका सैनिकोंसहित वध, देवता आदिकी सोलह हजार कन्याओंको पत्नीरूपमें स्वीकार करके श्रीकृष्णका उन्हें द्वारका भेजना तथा इन्द्रलोकमें जाकर अदितिको कुण्डल अर्पणकर द्वारकापुरीमें वापस आना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 44: नरकासुरका सैनिकोंसहित वध, देवता आदिकी सोलह हजार कन्याओंको पत्नीरूपमें स्वीकार करके श्रीकृष्णका उन्हें द्वारका भेजना तथा इन्द्रलोकमें जाकर अदितिको कुण्डल अर्पणकर द्वारकापुरीमें वापस आना  »  श्लोक d5
 
 
श्लोक  2.44.d5 
स भूम्यां मूर्तिलिङ्गस्थ: सर्वदेवासुरान्तक:।
मानुषाणामृषीणां च प्रतीपमकरोत् तदा॥
 
 
अनुवाद
नरकासुर, सभी देवताओं का अवतार, पृथ्वी के अंदर एक मूर्ति लिंग के रूप में रहता था और मनुष्यों और ऋषियों के विरुद्ध व्यवहार करता था।
 
Narakasura, the avatar of all gods, resided in the form of a Murthi Linga inside the earth and behaved against human beings and sages.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)