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श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 43: कालियमर्दन एवं धेनुकासुर, अरिष्टासुर और कंस आदिका वध, श्रीकृष्ण और बलरामका विद्याभ्यास तथा गुरुदक्षिणारूपसे गुरुजीको उनके मरे हुए पुत्रको जीवित करके देना  »  श्लोक d25
 
 
श्लोक  2.43.d25 
देवदेव: क्षितिं गत्वा कृष्णं दृष्ट्वा मुदान्वित:॥
गोविन्द इति तं ह्युक्त्वा ह्यभ्यषिञ्चत् पुरंदर:।
इत्युक्त्वाऽऽश्लिष्य गोविन्दं पुरुहूतोऽभ्ययाद् दिवम्।
 
 
अनुवाद
जब देवराज इन्द्र ने पृथ्वी पर जाकर श्रीकृष्ण को (गोवर्धन धारण किए हुए) देखा, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने श्रीकृष्ण को 'गोविन्द' नाम दिया और उनका ('गवेन्द्र' उपाधि से) अभिषेक किया। देवराज इन्द्र ने गोविन्द को हृदय से लगा लिया और उनकी अनुमति लेकर स्वर्गलोक चले गए।
 
When the God of gods Indra went to the earth and saw Shri Krishna (holding Govardhan), he was very happy. He gave Shri Krishna the name 'Govind' and anointed him (with the title 'Gavendra'). Devraj Indra embraced Govind to his heart and went to heaven after taking his permission.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)