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mahabharat 2.39.d17: भरतनंदन! भगवान नारायण के सभी अंग सर्वत्र व्याप्त हैं। राजन! आकाश उनका सिर है, आकाश उनकी नाभि है और पृथ्वी उनके चरण हैं।   |   mahabharat अध्याय 2.39: भगवान् नारायणकी महिमा और उनके द्वारा मधु-कैटभका वध   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  2.39.d17 
नारायणस्य चाङ्गानि सर्वदैवानि भारत।
शिरस्तस्य दिवं राजन् नाभि: खं चरणौ मही॥
 
 
अनुवाद
भरतनंदन! भगवान नारायण के सभी अंग सर्वत्र व्याप्त हैं। राजन! आकाश उनका सिर है, आकाश उनकी नाभि है और पृथ्वी उनके चरण हैं।
 
Bharatnandan! All the parts of Lord Narayana are omnipresent. Rajan! The sky is his head, the sky is his navel and the earth is his feet.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)