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mahabharat 2.32.4: वे चलते-चलते सुन्दर रोहितक पर्वत तथा उसके आस-पास के प्रदेश में पहुँचे, जो धन-धान्य से भरपूर तथा गौओं से भरपूर था और स्वामी कार्तिकेय को अत्यंत प्रिय था॥4॥   |   mahabharat अध्याय 2.32: नकुलके द्वारा पश्चिम दिशाकी विजय   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 32: नकुलके द्वारा पश्चिम दिशाकी विजय  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.32.4 
ततो बहुधनं रम्यं गवाढॺं धनधान्यवत्।
कार्तिकेयस्य दयितं रोहीतकमुपाद्रवत्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
वे चलते-चलते सुन्दर रोहितक पर्वत तथा उसके आस-पास के प्रदेश में पहुँचे, जो धन-धान्य से भरपूर तथा गौओं से भरपूर था और स्वामी कार्तिकेय को अत्यंत प्रिय था॥4॥
 
On their way, they reached the beautiful Rohitaka* mountain and its surrounding country, rich in wealth and abundance of cows and very dear to Swami Kartikeya. 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)