श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 29: भीमसेनका पूर्व दिशाको जीतनेके लिये प्रस्थान और विभिन्न देशोंपर विजय पाना  »  श्लोक 1-3h
 
 
श्लोक  2.29.1-3h 
वैशम्पायन उवाच
एतस्मिन्नेव काले तु भीमसेनोऽपि वीर्यवान्।
धर्मराजमनुप्राप्य ययौ प्राचीं दिशं प्रति॥ १॥
महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना।
हस्त्यश्वरथपूर्णेन दंशितेन प्रतापवान्॥ २॥
वृतो भरतशार्दूलो द्विषच्छोकविवर्द्धन:।
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - 'जनमेजय! इसी समय शत्रुओं का शोक बढ़ाने वाले भरतवंश के रत्न, महापराक्रमी भीमसेन भी धर्मराज की आज्ञा लेकर शत्रुओं के राज्य को कुचल देने वाली हाथी, घोड़े, रथ तथा कवच आदि से युक्त विशाल सेना लेकर पूर्व दिशा को जीतने के लिए चल पड़े।
 
Vaishmpayana says, 'Janamejaya! At this very time, the great and valiant Bhimasena, the jewel of the Bharata dynasty, who increases the grief of his enemies, also took the orders of Dharmaraja and set out to conquer the east with a huge army, full of elephants, horses, chariots and well-equipped with armour, etc., which would crush the kingdom of the enemies. 1-2 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)