Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 2.27.1: वैशम्पायन कहते हैं - हे जनमेजय! उनके ऐसा कहने पर धनंजय ने भगदत्त से कहा - 'हे राजन! आपने जो भी कर देने की बात कही है, उसी से मेरा सम्पूर्ण आतिथ्य संपन्न हो जाएगा। अब मुझे अनुमति दीजिए, मैं जाता हूँ।'   |   mahabharat अध्याय 2.27: अर्जुनका अनेक पर्वतीय देशोंपर विजय पाना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 27: अर्जुनका अनेक पर्वतीय देशोंपर विजय पाना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  2.27.1 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त: प्रत्युवाच भगदत्तं धनंजय:।
अनेनैव कृतं सर्वमनुजानीहि याम्यहम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं - हे जनमेजय! उनके ऐसा कहने पर धनंजय ने भगदत्त से कहा - 'हे राजन! आपने जो भी कर देने की बात कही है, उसी से मेरा सम्पूर्ण आतिथ्य संपन्न हो जाएगा। अब मुझे अनुमति दीजिए, मैं जाता हूँ।'
 
Vaishmpayana says - O Janamejaya! On his saying this, Dhananjaya said to Bhagadatta - 'O King! Whatever tax you have agreed to pay, my entire hospitality will be done with that. Now give me your permission, I am leaving.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)