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mahabharat 2.19.20: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तत्पश्चात, दीर्घकाल तक तपोवन में रहकर तपस्या करते हुए महाराज बृहद्रथ अपनी पत्नियों सहित स्वर्ग सिधार गए॥20॥   |   mahabharat अध्याय 2.19: चण्डकौशिक मुनिके द्वारा जरासंधका भविष्यकथन तथा पिताके द्वारा उसका राज्याभिषेक करके वनमें जाना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 19: चण्डकौशिक मुनिके द्वारा जरासंधका भविष्यकथन तथा पिताके द्वारा उसका राज्याभिषेक करके वनमें जाना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  2.19.20 
वैशम्पायन उवाच
अथ दीर्घस्य कालस्य तपोवनचरो नृप:।
सभार्य: स्वर्गमगमत् तपस्तप्त्वा बृहद्रथ:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तत्पश्चात, दीर्घकाल तक तपोवन में रहकर तपस्या करते हुए महाराज बृहद्रथ अपनी पत्नियों सहित स्वर्ग सिधार गए॥20॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Thereafter, while living in Tapovan for a long time and doing penance, Maharaj Brihadratha passed away along with his wives. 20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)