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mahabharat 2.18.6-7: अतः उस पूजा के बदले में मैं सदैव आपका कुछ उपकार करने का विचार करता रहता था। हे पुण्यात्मा! मैंने आपके पुत्र के शरीर के ये दो टुकड़े देखे और उन्हें जोड़ दिया। महाराज! ईश्वर की कृपा से इन टुकड़ों के जुड़ने से यह राजकुमार प्रकट हुआ है। मैं तो इसमें केवल एक माध्यम मात्र हूँ। 6-7।   |   mahabharat अध्याय 2.18: जरा राक्षसीका अपना परिचय देना और उसीके नामपर बालकका नामकरण होना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 18: जरा राक्षसीका अपना परिचय देना और उसीके नामपर बालकका नामकरण होना  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  2.18.6-7 
साहं प्रत्युपकारार्थं चिन्तयाम्यनिशं तव।
तवेमे पुत्रशकले दृष्टवत्यस्मि धार्मिक॥ ६॥
संश्लेषिते मया दैवात् कुमार: समपद्यत।
तव भाग्यान्महाराज हेतुमात्रमहं त्विह॥ ७॥
 
 
अनुवाद
अतः उस पूजा के बदले में मैं सदैव आपका कुछ उपकार करने का विचार करता रहता था। हे पुण्यात्मा! मैंने आपके पुत्र के शरीर के ये दो टुकड़े देखे और उन्हें जोड़ दिया। महाराज! ईश्वर की कृपा से इन टुकड़ों के जुड़ने से यह राजकुमार प्रकट हुआ है। मैं तो इसमें केवल एक माध्यम मात्र हूँ। 6-7।
 
Therefore, I always kept thinking of doing you some favour in return of that worship. O virtuous one! I saw these two pieces of your son's body and joined them. Maharaj! By the grace of God, by joining these pieces, this prince has appeared. I have become only a medium in this. 6-7.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)