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श्लोक 2.18.12  |
सोऽवर्धत महातेजा मगधाधिपते: सुत:।
प्रमाणबलसम्पन्नो हुताहुतिरिवानल:।
मातापित्रोर्नन्दिकर: शुक्लपक्षे यथा शशी॥ १२॥ |
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| अनुवाद |
| मगधराज का वह परम तेजस्वी पुत्र अपने माता-पिता को सुख पहुँचाता हुआ, आकार और बल में बढ़ता गया और घी की आहुति से प्रज्वलित अग्नि और शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा के समान दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगा॥ 12॥ |
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| That very illustrious son of the King of Magadha, giving joy to his parents, grew in size and strength and started growing day by day like the fire ignited by the offering of ghee and like the moon in the Shukla paksha.॥ 12॥ |
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इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि राजसूयारम्भपर्वणि जरासंधोत्पत्तौ अष्टादशोऽध्याय:॥ १८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत राजसूयारम्भपर्वमें जरासंधकी उत्पत्तिविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १८॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १३ श्लोक हैं) |
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