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mahabharat 2.17.d5: ‘मुने! संतानहीन मनुष्य न तो इस लोक में यश पाता है और न परलोक में शाश्वत स्वर्ग।’ राजा के ऐसा कहने पर महर्षि को दया आ गई।   |   mahabharat अध्याय 2.17: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी बातका अनुमोदन तथा युधिष्ठिरको जरासंधकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  2.17.d5 
नाप्रजस्य मुने कीर्ति: स्वर्गश्चैवाक्षयो भवेत्।
एवमुक्तस्य राज्ञा तु मुने: कारुण्यमागतम्॥)
 
 
अनुवाद
‘मुने! संतानहीन मनुष्य न तो इस लोक में यश पाता है और न परलोक में शाश्वत स्वर्ग।’ राजा के ऐसा कहने पर महर्षि को दया आ गई।
 
'Mune! A childless man neither gets fame in this world nor an everlasting heaven in the next world.' Maharishi felt pity when the king said this.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)