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श्लोक  2.17.31 
एतच्छ्रुत्वा मुनेर्वाक्यं शिरसा प्रणिपत्य च।
मुने: पादौ महाप्राज्ञ: स नृप: स्वगृहं गत:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
ऋषि के ये वचन सुनकर अत्यंत बुद्धिमान राजा बृहद्रथ ने उनके चरणों में सिर नवाया और अपने घर लौट गया।
 
Hearing these words of the sage, the extremely intelligent king Brihadratha bowed his head at his feet and returned to his home.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)