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mahabharat 2.15.14-15: श्रीकृष्ण ने कहा- राजन! अज्ञानी मनुष्य बड़े-बड़े कार्य तो आरम्भ कर देता है, परन्तु उनके फल पर ध्यान नहीं देता। अतः वीर पुरुष, केवल अपने स्वार्थ साधने में लगे हुए विवेकहीन शत्रु के आचरण को सहन नहीं कर सकते। युवनाश्व के पुत्र मान्धाता ने विजय योग्य शत्रुओं को परास्त करके सम्राट पद प्राप्त किया। भगीरथ प्रजापालन से, कार्तवीर्य (हजार भुजाओं वाले अर्जुन) तपस्या के बल से और राजा भरत स्वाभाविक शक्ति से सम्राट बने। 14-15॥   |   mahabharat अध्याय 2.15: जरासंधके विषयमें राजा युधिष्ठिर, भीम और श्रीकृष्णकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 15: जरासंधके विषयमें राजा युधिष्ठिर, भीम और श्रीकृष्णकी बातचीत  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक  2.15.14-15 
कृष्ण उवाच
अर्थानारभते बालो नानुबन्धमवेक्षते।
तस्मादरिं न मृष्यन्ति बालमर्थपरायणम्॥ १४॥
जित्वा जय्यान् यौवनाश्वि: पालनाच्च भगीरथ:।
कार्तवीर्यस्तपोवीर्याद् बलात् तु भरतो विभु:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
श्रीकृष्ण ने कहा- राजन! अज्ञानी मनुष्य बड़े-बड़े कार्य तो आरम्भ कर देता है, परन्तु उनके फल पर ध्यान नहीं देता। अतः वीर पुरुष, केवल अपने स्वार्थ साधने में लगे हुए विवेकहीन शत्रु के आचरण को सहन नहीं कर सकते। युवनाश्व के पुत्र मान्धाता ने विजय योग्य शत्रुओं को परास्त करके सम्राट पद प्राप्त किया। भगीरथ प्रजापालन से, कार्तवीर्य (हजार भुजाओं वाले अर्जुन) तपस्या के बल से और राजा भरत स्वाभाविक शक्ति से सम्राट बने। 14-15॥
 
Shri Krishna said- Rajan! An ignorant man starts big works, but does not look at their results. Therefore, brave men cannot tolerate the behavior of a conscienceless enemy who is engaged only in pursuing his own interests. Mandhata, son of Yuvanashwa, attained the position of emperor by defeating the conquerable enemies. Bhagiratha became emperor by obeying the people, Kartavirya (thousand-armed Arjun) by the power of penance and King Bharat by natural power. 14-15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)