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mahabharat 2.13.51: परंतु आप उपरोक्त समस्त कारणों तथा काम-क्रोध से रहित होकर अपने मूल स्वरूप में स्थित हैं। अतः कृपा करके मुझे बताइए कि इस संसार में मेरे लिए क्या करना उत्तम और उचित है ॥ 51॥   |   mahabharat अध्याय 2.13: युधिष्ठिरका राजसूयविषयक संकल्प और उसके विषयमें भाइयों, मन्त्रियों, मुनियों तथा श्रीकृष्णसे सलाह लेना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 13: युधिष्ठिरका राजसूयविषयक संकल्प और उसके विषयमें भाइयों, मन्त्रियों, मुनियों तथा श्रीकृष्णसे सलाह लेना  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  2.13.51 
त्वं तु हेतूनतीत्यैतान् कामक्रोधौ व्युदस्य च।
परमं यत् क्षमं लोके यथावद् वक्तुमर्हसि॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
परंतु आप उपरोक्त समस्त कारणों तथा काम-क्रोध से रहित होकर अपने मूल स्वरूप में स्थित हैं। अतः कृपा करके मुझे बताइए कि इस संसार में मेरे लिए क्या करना उत्तम और उचित है ॥ 51॥
 
But you are situated in your original form, being devoid of all the above reasons and lust and anger. Therefore, kindly tell me exactly what is best and appropriate for me to do in this world. ॥ 51॥
 
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि राजसूयारम्भपर्वणि वासुदेवागमने त्रयोदशोऽध्याय:॥ १३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत राजसूयारम्भपर्वमें वासुदेवागमनविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ५३ १/२ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)