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mahabharat 2.12.34: नारदजी के चले जाने पर श्रेष्ठ कुन्तीनन्दन राजा युधिष्ठिर अपने भाइयों सहित राजसूय नामक महान यज्ञ के विषय में सोचने लगे ॥34॥   |   mahabharat अध्याय 2.12: राजा हरिश्चन्द्रका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरके प्रति राजा पाण्डुका संदेश   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 12: राजा हरिश्चन्द्रका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरके प्रति राजा पाण्डुका संदेश  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  2.12.34 
गते तु नारदे पार्थो भ्रातृभि: सह कौरव:।
राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं चिन्तयामास पार्थिव:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
नारदजी के चले जाने पर श्रेष्ठ कुन्तीनन्दन राजा युधिष्ठिर अपने भाइयों सहित राजसूय नामक महान यज्ञ के विषय में सोचने लगे ॥34॥
 
After Naradji left, the best Kuntinandan king Yudhishthir along with his brothers started thinking about the great yagya called Rajasuya. 34॥
 
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यानपर्वणि पाण्डुसंदेशकथने द्वादशोऽध्याय:॥ १२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत लोकपालसभाख्यानपर्वमें पाण्डु-संदेश-कथनविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ३७ १/२ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)