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mahabharat 2.12.29: राजन! इस महान यज्ञ में अनेक विघ्न आने की सम्भावना है; क्योंकि यज्ञ का विध्वंसक ब्रह्मराक्षस इसका छिद्र खोजता रहता है। 29॥   |   mahabharat अध्याय 2.12: राजा हरिश्चन्द्रका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरके प्रति राजा पाण्डुका संदेश   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 12: राजा हरिश्चन्द्रका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरके प्रति राजा पाण्डुका संदेश  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  2.12.29 
बहुविघ्नश्च नृपते क्रतुरेष स्मृतो महान्।
छिद्राण्यस्य तु वाञ्छन्ति यज्ञघ्ना ब्रह्मराक्षसा:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
राजन! इस महान यज्ञ में अनेक विघ्न आने की सम्भावना है; क्योंकि यज्ञ का विध्वंसक ब्रह्मराक्षस इसका छिद्र खोजता रहता है। 29॥
 
Rajan! There is a possibility of many obstacles in this great yagya; Because Brahmarakshas, the destroyer of Yagya, keeps searching for its hole. 29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)