श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 11: ब्रह्माजीकी सभाका वर्णन  »  श्लोक 8-9
 
 
श्लोक  2.11.8-9 
स तन्मम वच: श्रुत्वा सहस्रांशुर्दिवाकर:।
प्रोवाच भरतश्रेष्ठ व्रतं वर्षसहस्रिकम्॥ ८॥
ब्रह्मव्रतमुपास्स्व त्वं प्रयतेनान्तरात्मना।
ततोऽहं हिमवत्पृष्ठे समारब्धो महाव्रतम्॥ ९॥
 
 
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! मेरी बातें सुनकर सहस्त्र किरणों वाले भगवान सूर्य ने कहा, ‘तुम एकाग्र मन से ब्रह्माजी का व्रत करो। वह महान व्रत एक हजार वर्षों में पूरा होगा।’ तब मैं हिमालय की चोटी पर आया और उस महान व्रत को करने लगा।
 
O best of the Bharatas! On hearing my words, the Lord Sun with thousands of rays said, 'You should observe the fast of Lord Brahma with a concentrated mind. That great fast will be completed in a thousand years.' Then I came to the peak of the Himalayas and started performing that great fast. 8-9.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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