| श्री महाभारत » पर्व 2: सभा पर्व » अध्याय 11: ब्रह्माजीकी सभाका वर्णन » श्लोक 60-61 |
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| | | | श्लोक 2.11.60-61  | सर्वतेजोमयी दिव्या ब्रह्मर्षिगणसेविता।
ब्राह्मॺा श्रिया दीप्यमाना शुशुभे विगतक्लमा॥ ६०॥
सा सभा तादृशी दृष्टा मया लोकेषु दुर्लभा।
सभेयं राजशार्दूल मनुष्येषु यथा तव॥ ६१॥ | | | | | | अनुवाद | | हे राजनश्रेष्ठ! वह सभा तेज से परिपूर्ण, दिव्य, ब्रह्मऋषियों के समूह से सेवित, निष्पाप, ब्रह्मा के तेज से सदैव प्रकाशित एवं सुशोभित है। मैंने उस सभा को देखा है। जैसे आपकी सभा मनुष्यों के लोक में दुर्लभ है, उसी प्रकार ब्रह्मा की सभा समस्त लोकों में अत्यंत दुर्लभ है। 60-61। | | | | O best of kings! That assembly is full of brilliance, divine and is served by the group of Brahmarishis, sinless and is always shining and decorated with Brahma's glory. I have seen that assembly. Just like your assembly is rare in the world of humans, in the same way Brahma's assembly is extremely rare in all the worlds. 60-61. | | ✨ ai-generated | | |
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