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mahabharat 2.11.58: हे प्रभु! वे अनन्त तेजोमय विश्वात्मा स्वयंभू इन सब अतिथियों का स्वागत करते हैं, उन्हें सान्त्वना देते हैं, उनका आदर करते हैं, उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं तथा उनकी आवश्यकता और रुचि के अनुसार उन्हें भौतिक भोग प्रदान करते हैं ॥ 58॥   |   mahabharat अध्याय 2.11: ब्रह्माजीकी सभाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 11: ब्रह्माजीकी सभाका वर्णन  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  2.11.58 
प्रतिगृह्य तु विश्वात्मा स्वयम्भूरमितद्युति:।
सान्त्वमानार्थसम्भोगैर्युनक्ति मनुजाधिप॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! वे अनन्त तेजोमय विश्वात्मा स्वयंभू इन सब अतिथियों का स्वागत करते हैं, उन्हें सान्त्वना देते हैं, उनका आदर करते हैं, उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं तथा उनकी आवश्यकता और रुचि के अनुसार उन्हें भौतिक भोग प्रदान करते हैं ॥ 58॥
 
O Lord! The infinitely radiant Universal Soul, Swayambhu, welcomes all these guests, consoles them, honours them, fulfils their needs and provides them with material enjoyments as per their needs and tastes. ॥ 58॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)