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श्लोक 2.11.1  |
नारद उवाच
पितामहसभां तात कथ्यमानां निबोध मे।
शक्यते या न निर्देष्टुमेवंरूपेति भारत॥ १॥ |
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| अनुवाद |
| नारदजी कहते हैं - हे भरत! अब मेरे द्वारा कहे गए पितामह ब्रह्माजी की सभा का वर्णन सुनो। वह सभा ऐसी है कि उसका इस रूप में वर्णन नहीं किया जा सकता।॥1॥ |
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| Naradji says - Dear Bharata! Now listen to the description of the assembly of Grandfather Brahmaji told by me. That assembly is such that it cannot be described in this form. ॥ 1॥ |
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