श्री महाभारत  »  पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व  »  अध्याय 3: इन्द्र और धर्मका युधिष्ठिरको सान्त्वना देना तथा युधिष्ठिरका शरीर त्यागकर दिव्य लोकको जाना  »  श्लोक 15-16h
 
 
श्लोक  18.3.15-16h 
तेन त्वमेवं गमितो मया श्रेयोऽर्थिना नृप।
व्याजेन हि त्वया द्रोण उपचीर्ण: सुतं प्रति॥ १५॥
व्याजेनैव ततो राजन् दर्शितो नरकस्तव।
 
 
अनुवाद
नरेश्वर! तुम्हारे कल्याण की इच्छा से ही मैंने तुम्हें नरक का दर्शन कराने के लिए पहले ही यहाँ भेजा है। राजन! तुमने गुरुपुत्र अश्वत्थामा के विषय में द्रोणाचार्य को छल से उनके पुत्र की मृत्यु का विश्वास दिलाया था, इसलिए तुम्हें भी छल से नरक दिखाया गया है। 15 1/2॥
 
Nareshwar! With a desire for your welfare, I have already sent you here to give you a glimpse of hell. Rajan! You had made Dronacharya believe about his son's death by deceit regarding Guru's son Ashwatthama, hence you too have been shown to hell by deceit. 15 1/2॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd