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श्री महाभारत  »  पर्व 18: स्वर्गारोहण पर्व  »  अध्याय 2: देवदूतका युधिष्ठिरको नरकका दर्शन कराना तथा भाइयोंका करुण-क्रन्दन सुनकर उनका वहीं रहनेका निश्चय करना  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  18.2.36 
एवं बहुविधा वाच: कृपणा वेदनावताम्।
तस्मिन् देशे स शुश्राव समन्ताद् वदतां नृप॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! इस प्रकार उस क्षेत्र में सब ओर से दुःखी प्राणियों की करुण पुकार उन्हें सुनाई देने लगी। 36.
 
O Lord of men! In this manner, he began to hear the pitiable cries of the distressed beings suffering there from all sides in that region. 36.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)