Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 17.2.7: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! ऐसा कहकर, उनकी ओर देखे बिना ही, भरतभूषण, पुरुषों में श्रेष्ठ, बुद्धिमान और धर्मात्मा युधिष्ठिर मन को एकाग्र करके आगे बढ़ गए॥7॥   |   mahabharat अध्याय 17.2: मार्गमें द्रौपदी, सहदेव, नकुल, अर्जुन और भीमसेनका गिरना तथा युधिष्ठिरद्वारा प्रत्येकके गिरनेका कारण बताया जाना   ।   mahabharat पर्व 17: महाप्रस्थानिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 17: महाप्रस्थानिक पर्व  »  अध्याय 2: मार्गमें द्रौपदी, सहदेव, नकुल, अर्जुन और भीमसेनका गिरना तथा युधिष्ठिरद्वारा प्रत्येकके गिरनेका कारण बताया जाना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  17.2.7 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वानवेक्ष्यैनां ययौ भरतसत्तम:।
समाधाय मनो धीमान् धर्मात्मा पुरुषर्षभ:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! ऐसा कहकर, उनकी ओर देखे बिना ही, भरतभूषण, पुरुषों में श्रेष्ठ, बुद्धिमान और धर्मात्मा युधिष्ठिर मन को एकाग्र करके आगे बढ़ गए॥7॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Having said this, without even looking at him, Bharatbhushan, the best of men, the wise and virtuous Yudhishthir concentrated his mind and moved ahead. 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)