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mahabharat 16.6.26-27: तब से मैं आपके दोनों भाइयों बलराम और श्रीकृष्ण तथा आपके परिवार के सदस्यों के भयंकर नरसंहार का स्मरण करके शोक से द्रवित हो रहा हूँ। मैं भोजन करने में असमर्थ हूँ। अब मैं न तो भोजन करूँगा और न ही यह जीवन धारण करूँगा। हे पाण्डुपुत्र! यह सौभाग्य है कि आप यहाँ आए हैं। 26-27   |   mahabharat अध्याय 16.6: द्वारकामें अर्जुन और वसुदेवजीकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 16: मौसल पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 16: मौसल पर्व  »  अध्याय 6: द्वारकामें अर्जुन और वसुदेवजीकी बातचीत  »  श्लोक 26-27
 
 
श्लोक  16.6.26-27 
सोऽहं तौ च महात्मानौ चिन्तयन् भ्रातरौ तव॥ २६॥
घोरं ज्ञातिवधं चैव न भुञ्जे शोककर्शित:।
न भोक्ष्ये न च जीविष्ये दिष्ट्या प्राप्तोऽसि पाण्डव॥ २७॥
 
 
अनुवाद
तब से मैं आपके दोनों भाइयों बलराम और श्रीकृष्ण तथा आपके परिवार के सदस्यों के भयंकर नरसंहार का स्मरण करके शोक से द्रवित हो रहा हूँ। मैं भोजन करने में असमर्थ हूँ। अब मैं न तो भोजन करूँगा और न ही यह जीवन धारण करूँगा। हे पाण्डुपुत्र! यह सौभाग्य है कि आप यहाँ आए हैं। 26-27
 
Since then I am melting in grief thinking about the terrible massacre of your two brothers, Balarama and Shri Krishna and your family members. I am unable to eat food. Now I will neither eat food nor keep this life. O son of Pandu! It is fortunate that you have come here. 26-27.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)