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mahabharat 15.9.17-18h: हे निर्दोष प्रजाजनों! मेरे पुत्रों के मन चंचल थे। वे लोभी और स्वेच्छाचारी थे। आज मैं गांधारी सहित आप सभी से उनके अपराधों के लिए क्षमा माँगता हूँ। 17 1/2   |   mahabharat अध्याय 15.9: प्रजाजनोंसे धृतराष्ट्रकी क्षमा-प्रार्थना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 9: प्रजाजनोंसे धृतराष्ट्रकी क्षमा-प्रार्थना  »  श्लोक 17-18h
 
 
श्लोक  15.9.17-18h 
तेषामस्थिरबुद्धीनां लुब्धानां कामचारिणाम्॥ १७॥
कृते याचेऽद्य व: सर्वान् गान्धारीसहितोऽनघा:।
 
 
अनुवाद
हे निर्दोष प्रजाजनों! मेरे पुत्रों के मन चंचल थे। वे लोभी और स्वेच्छाचारी थे। आज मैं गांधारी सहित आप सभी से उनके अपराधों के लिए क्षमा माँगता हूँ। 17 1/2
 
O innocent subjects! My sons' minds were fickle. They were greedy and willful. Today, along with Gandhari, I seek forgiveness from all of you for their crimes. 17 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)