वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त: स राजर्षिर्धर्मराजेन धीमता।
कौन्तेयं समनुज्ञातुमियेष भरतर्षभ॥ ४॥
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - भरतश्रेष्ठ! बुद्धिमान धर्मराज युधिष्ठिर की यह बात सुनकर मुनि धृतराष्ट्र ने कुन्तीकुमार से जाने की अनुमति लेनी चाही और कहा - ॥4॥
Vaishampayanji says – Bharatshreshtha! On hearing this from the wise Dharmaraja Yudhishthira, the sage Dhritarashtra wanted to take permission from Kuntikumar to go and said – ॥ 4॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥