श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 8: धृतराष्ट्रका कुरुजांगलदेशकी प्रजासे वनमें जानेके लिये आज्ञा माँगना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  15.8.4 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त: स राजर्षिर्धर्मराजेन धीमता।
कौन्तेयं समनुज्ञातुमियेष भरतर्षभ॥ ४॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - भरतश्रेष्ठ! बुद्धिमान धर्मराज युधिष्ठिर की यह बात सुनकर मुनि धृतराष्ट्र ने कुन्तीकुमार से जाने की अनुमति लेनी चाही और कहा - ॥4॥
 
Vaishampayanji says – Bharatshreshtha! On hearing this from the wise Dharmaraja Yudhishthira, the sage Dhritarashtra wanted to take permission from Kuntikumar to go and said – ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)