श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 8: धृतराष्ट्रका कुरुजांगलदेशकी प्रजासे वनमें जानेके लिये आज्ञा माँगना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  15.8.22 
मम चान्धस्य वृद्धस्य हतपुत्रस्य का गति:।
ऋते वनं महाभागास्तन्मानुज्ञातुमर्हथ॥ २२॥
 
 
अनुवाद
एक तो मैं जन्म से ही अंधा हूँ, दूसरे मैं बूढ़ा हो गया हूँ, तीसरे मेरे सभी पुत्र मर चुके हैं। हे सौभाग्यशाली प्रजाजनों! अब आप ही बताइए कि मेरे लिए वन जाने के अलावा और कौन-सा मार्ग है? अतः अब आप सभी मुझे जाने की अनुमति प्रदान करें।
 
‘First of all I am blind from birth, secondly I have grown old, thirdly all my sons have died. O fortunate subjects! Now you tell me, what other path is there for me except going to the forest? Therefore now you all please give me permission to go.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)