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mahabharat 15.8.10-11h: वैशम्पायन कहते हैं- जनमेजय! इतना कहकर राजा धृतराष्ट्र ने अपने विचार धर्मराज युधिष्ठिर के पास भेज दिये। राजा युधिष्ठिर ने उनकी आज्ञानुसार सारी सामग्री एकत्रित कर ली (धृतराष्ट्र ने उसे यथोचित वितरित कर दिया)। ॥10 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 15.8: धृतराष्ट्रका कुरुजांगलदेशकी प्रजासे वनमें जानेके लिये आज्ञा माँगना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 8: धृतराष्ट्रका कुरुजांगलदेशकी प्रजासे वनमें जानेके लिये आज्ञा माँगना  »  श्लोक 10-11h
 
 
श्लोक  15.8.10-11h 
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा धर्मराजाय प्रेषयामास वै तदा॥ १०॥
स च तद् वचनात् सर्वं समानिन्ये महीपति:।
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं- जनमेजय! इतना कहकर राजा धृतराष्ट्र ने अपने विचार धर्मराज युधिष्ठिर के पास भेज दिये। राजा युधिष्ठिर ने उनकी आज्ञानुसार सारी सामग्री एकत्रित कर ली (धृतराष्ट्र ने उसे यथोचित वितरित कर दिया)। ॥10 1/2॥
 
Vaishampayana says- Janamejaya! Having said this, king Dhritarashtra sent his thoughts to Dharmaraja Yudhishthira. King Yudhishthira collected all the material as per his orders (Dhritarashtra distributed it appropriately). ॥10 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)