श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 4: व्यासजीके समझानेसे युधिष्ठिरका धृतराष्ट्रको वनमें जानेके लिये अनुमति देना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  15.4.17 
अनुजानीहि पितरं समयोऽस्य तपोविधौ।
न मन्युर्विद्यते चास्य सुसूक्ष्मोऽपि युधिष्ठिर॥ १७॥
 
 
अनुवाद
अतः तुम अपने पिता को वन जाने दो; क्योंकि अब उनके तप करने का समय आ गया है। युधिष्ठिर! उन्हें तुम्हारे प्रति किंचितमात्र भी द्वेष नहीं है।॥17॥
 
‘Therefore, you should allow your father to go to the forest; because now the time has come for him to do penance. Yudhishthira! He does not have even the slightest resentment against you.'॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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